Rural Management

स्थापना- 2004

भारत गाँवों का देश है, गाँवों में बसी 2 तिहाई आबादी का उत्कर्ष एवं उत्थान ही राष्ट्र का वास्तविक विकास है। आजादी के बाद पिछले  64 वर्षों में गाँवों के विकास को वह स्वरूप व दिशा-धारा नहीं दी जा सकी जो यहाँ की परिस्थितियों व आवश्यकता के अनुकूल होती और गाँवों में वह स्थिति पैदा करती जिससे गाँवों से शहरों की ओर तेजी से हुए पलायन एवं गंदी बस्तियों के रूप में बढ़ती शहरी आबादी की गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता।

युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने अपनी युग निर्माण योजना में गाँवों के विकास एवं उत्थान को विशेष महत्व देते हुए इसके लिए घोर प्रयत्न करने, इस हेतु किए गये परिश्रम को गाँव देवता की पूजा मानने तथा भारत के प्रत्येक गाँव को एक ऐसे छोटे तीर्थ के रूप में विकसित करने की बात कही जो संस्कारयुक्त, व्यसनमुक्त, स्वच्छ, शिक्षित, स्वावलम्बी एवं सहकार-सहयोग से भरा पूरा हो। इसे मूर्तरूप देने हेतु पहल के रूप में अगस्त 1997 से मार्च 98 तक  6  दिन के, अप्रैल 98 से दिसम्बर 2000 तक 7 दिन के तथा जनवरी 2001 से अब तक 9 दिन के प्रशिक्षण प्रति माह ऋषि सूत्रों पर आधारित स्वावलम्बी ग्राम्य विकास के 2 प्रशिक्षण सत्र गायत्री परिजनों के लिए शांतिकुंज अकादमी में चलाए गये। प्रशिक्षण प्राप्त किए परिजनों के माध्यम से विभिन्न प्रदेशों के अनेक गाँवों में सामूहिक श्रमदान, गोसंवर्धन हेतु गोशालाओं की स्थापना, गो आधारित उद्योग, गो आधारित स्वास्थ्य एवं जैविक खेती जैसे कार्यक्रमों ने एक अभियान का रूप धारण किया । 50 से अधिक स्वावलम्बन केन्द्र, 35 रचनात्मक ट्रस्ट तथा ग्रामीण जनता को स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण देने के लिए 40 से अधिक रचनात्मक प्रशिक्षण केन्द्र क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। श्रमदान, अंशदान के आधार पर गाँवों के विकास की एक नयी कार्य प्रणाली जनता के अपने प्रयासों से स्वैच्छिक स्वयं सेवियों (Volunteers) के माध्यम से प्रारम्भ हुई। इसके परिणामों एवं सफलता से प्रोत्साहित होकर कार्यक्रम को समय की आवश्यकता व माँग के अनुरूप विस्तार देने के लिए 9 दिवसीय स्वावलम्बी ग्राम्य विकास के शांतिकुंज में चलाये जा रहे प्रशिक्षणों का प्रोन्नत (Upgraded) एवं परिशोधित स्वरूप वर्ष 2004 में 6 मासीय ग्राम प्रबंधन एवं उद्यमिता विकास पाठ्यक्रम के रूप में विश्वविद्यालय में प्रारम्भ किया गया जो अभी तक चलता रहा है।

युग निर्माण मिशन शांतिकुंज जो कि विश्वविद्यालय की मातृ संस्था है, का लक्ष्य अध्यात्मिकता को आधार बनाते हुए सामाजिक क्रांति है अर्थात समाज की समस्याओं का समाधान। हमारा देश ग्राम प्रधान होने के कारण यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी गाँवों में बसती है। आजादी के बाद विकास का लाभ लेकर यद्यपि कुछ मुट्ठी भर लोग साधन व सुविधा सम्पन्न अवश्य हुए हैं, परन्तु ग्रामीण क्षेत्र का बहुसंख्यक समाज आज भी न केवल अभाव व पीड़ाग्रस्त है बल्कि दयनीय स्थिति में है। बेरोजगारी व गरीबी, कृषि  व पशुपालन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा, सूखा व जल संकट, अनीति व भ्रष्टाचार, विभिन्न प्रकार के व्यसन व प्रदर्शन आदि से सम्बंधित अनेक समस्याओं से लोग पीड़ित हैं, परन्तु इसका समुचित समाधान उन्हें मिल नहीं पा रहा है। अतः मिशन की गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु अब ग्रामीण क्षेत्र है तथा मिशन ग्राम्य विकास कार्यक्रम को एक अभियान का रूप देने के लिए कृत संकल्प है। इसके लिए भारी संख्या में ऐसे युवाओं की जरूरत है जो जमीनी स्तर पर गाँवों की समस्याओं, आवश्यकताओं, संसाधनों एवं संभावनाओं की समझ एवं समाधान हेतु तकनीकी दक्षता रखते हों तथा जो आर्थिक रूप से स्वयं स्वावलम्बी होने के साथ-साथ अपने ज्ञान व दक्षता का उपयोग परोक्ष या अपरोक्ष रूप से ग्राम्य विकास के लिए कर सकें।